मौर्य साम्राज्य

 

मौर्य साम्राज्य

( 0पू0 322 से ई0पू0 184 तक )

मौर्य कालीन इतिहास के स्त्रोत :-

· ब्राम्हण ग्रन्थ :- ब्राम्हण ग्रन्थों में मौर्यों को शूद्र बताया गया है।

· विष्णु पुराण :- यह मौर्य युगीन इतिहास को जानने का महत्तवपूर्ण साधन है किन्तु इसमें बताया गया है कि मौर्य वंश की शूद्रता विद्वानों द्वारा अमान्य है। विष्णु पुराण के टीकाकार ‘‘ श्रीधर स्वामी ’’ ने चन्द्रगुप्त को घननन्द की पत्नी मुरा की संतान बताया है।

·  मुद्रा राक्षस :- विशाख दत्त ने अपने इस नाटक में चन्द्रगुप्त को ‘‘ वृषल ’’ ( कुल हीन ) बताया है। दसवीं सदी में मुद्रा राक्षस के टीकाकार ‘‘ घुण्डिराज ’’ ने इसे शूद्र कहा है। इसके अलावा मौर्यों की सामाजिक , आर्थिक तथा प्रशासनिक व्यवस्था पर प्रकाश डालने वाले प्रमुख ब्राम्हण ग्रन्थ : अर्थषास्त्र (कौटिल्य), वृह्त्कथा मंजरी (क्षेमेन्द्र) कथासरित्सागर, राजतरंगिणी आदि हैं।

· बौद्ध साहित्य :- इनमें विशेषतः महापरिनिब्बान सूत्र मौर्यों को पिप्पलीवन के मौर्यों से जोड़ते हैं, जिसे सत्यता के करीब मान्यता प्राप्त है।

· जैन साहित्य :- जैन साहित्य में मौर्य वंश, विशेषकर चंद्रगुप्त मौर्य और सम्प्रति, के इतिहास को महत्वपूर्ण माना गया है।

चन्द्रगुप्त मौर्य ( ई0पू0 322 से ई0पू0 298 )

प्रारंभिक जीवन :- चन्द्रगुप्त के प्रारंभिक जीवन का ज्ञान बौद्ध साहित्य से ज्ञात होता है। इसका संबंध पिप्पलीवन के मोरिय वंश से था जिसे शाक्यों की एक शाखा के रूप में स्वीकार किया जाता है। चन्द्र की माँ अपने पति की मृत्यु के बाद ‘‘ पाटलिपुत्र ’’ आ गई जहां लगभग 3450पू0 को चन्द्रगुप्त का जन्म हुआ। नन्द नरेश द्वारा अपमानित चाणक्य ने इसे विद्वतापूर्वक             ‘‘ राजकीलकम् ’’ खेल में संलग्न देख तथा इससे प्रभावित हो कर नन्द वंश का उत्तराधिकारी बनाने का संकल्प किया। अतः चाणक्य जो कि तक्षशिला के शिक्षा केन्द्र का आचार्य था, ने चन्द्रगुप्त को उसके संरक्षक ‘‘ गोपालक  से 1000 कार्षापण दे कर खरीदा तथा तक्षशिला ले गया। जस्टिन तथा प्लूटार्क ने तक्षशिला में इसके प्रशक्षण का विशद वर्णन किया है। इसी समय चन्द्रगुप्त , सिकन्दर से मिला किन्तु चन्द्र की स्पष्टवादिता ने सिकन्दर को क्रुद्ध कर दिया अतः किसी तरह चन्द्र जान बचा कर भाग निकला।

प्रारंभिक अभियान :-  सिकन्दर की वापसी के बाद चाणक्य की सहायता से चन्द्रगुप्त ने पंजाब की युद्ध प्रिय जातियों की एक सेना बनाई तथा विदेशी यूनानी को पश्चिमोत्तर भारत से भगाने में सफल आदर्श जनता के समक्ष प्रस्तुत किया। इस कार्य में चन्द्रगुप्त को हिमालय के पहाड़ी राजा ‘‘ पर्वतक ’’ से पूर्ण सहयोग मिला। एक विद्रोह में फिलिप की हत्या (ई0पू0 325 ) तथा सिकन्दर की मृत्यु ने इस अभियान को गति दी एवं अपनी प्रथम विजय के रूप में पंजाब विजय की।

मगध पर आक्रमण :- अपने प्रथम प्रयास में चन्द्रगुप्त को असफलता मिली। बौद्ध ग्रंथ महावंश टीका में बुढ़िया - बालक की कहानी मिलती है। जिससे शिक्षा प्राप्त कर अपने द्वितीय प्रयास में चन्द्रगुप्त ने घननन्द को हरा कर मार डाला तथा मगध पर कब्जा जमा लिया।

राज्याभिषेक :- ई0पू0 322 को चाणक्य ने चन्द्रगुप्त मौर्य का राज्याभिषेक कर दिया। ई0पू0 317 तक अंतिम यूनानी क्षत्रप     ‘ यूथाईडेमस ’ भी चला गया। चन्द्रगुप्त मौर्य ने अपनी राजधानी ‘ पाटलिपुत्र ’ में बनाई।

सेल्युकस से युद्ध (ई0पू0 305 ) :-

भारत विजय की कामना में बेबीलोन का सेल्युकस निकेटर ने भारत पर आक्रमण किया किन्तु चन्द्रगुप्त ने उसे परास्त कर दिया तथा निम्न शर्तों पर संधि हो गई।

1. सेल्युकस की पुत्री ‘ हेलेन ’ का चन्द्रगुप्त से विवाह।

2. एरिया (हेरात), परोपनिसदै (काबुल),अराकोसिया(कन्धार) तथा जेड्रोषिया (मकरान) दहेज में चन्द्रगुप्त को प्राप्त हुआ।

3. सेल्युकस ने अपने राजदूत ‘ मेगस्थनीज ’ को मौर्य दरबार में भेजा।

4. चन्द्रगुप्त ने 500 हाथी भेंट स्वरूप सेल्युकस को दिए जो सेल्युकस के प्रतिद्वंद्वी एण्तगोनस से युद्ध में काम आए। ( इस युद्ध का एक मात्र उल्लेख कर्त्ता ‘‘ एप्पिऑनस ’’ है।

पश्चिम भारत की विजय :- शक क्षत्रप रूद्रदामन के जूनागढ़ अभिलेख ( ईस्वी 150) से ज्ञात होता है कि चन्द्र के सौराष्ट्र के राज्यपाल ‘पुष्यगुप्त वैश्य’ ने सुदर्शन झील का निर्माण कराया था तथा अशोक के सोपारा अभिलेख से भी पश्चिम भारत पर चन्द्रगुप्त के आधिपत्य की पुष्टि होती है।

दक्षिण भारत की विजय :- मुद्रा राक्षस के अनुसार मैसूर के भू भागों पर चन्द्र का आधिपत्य था। क्योंकि कहा जाता है मगध में अकाल पड़ने पर चन्द्रगुप्त जैन साधु ‘ भद्रबाहु ’ के साथ श्रावणबेलागोला (मैसूर) के चन्द्रगिरि पहाड़ी पर आ गया। यहां पर चन्द्रगुप्त ने अपने अंतिम दिन बिताए एवं ‘ चन्द्रगुप्त बस्ती ’ नामक मंदिर का निर्माण कराया।

मृत्यु :- ई0पू0 298 को संलेखना द्वारा चन्द्रगुप्त ने श्रवणबेलागोला में प्राण त्यागे।

महत्तवपूर्ण तथ्य :-

 यूनानी लेखकों द्वारा वर्णित ‘ सेण्ड्रोकोट्स ’ या ‘ एण्ड्रोकोट्स ’ की पहचान चन्द्रगुप्त के रूप में सर्वप्रथम ‘‘ विलियम जोन्स ’’ ने की।

 चन्द्रगुप्त का सर्वप्रथम आक्रमण मगध पर था जो असफल रहा।

 जस्टिन ने चन्द्रगुप्त की सेना को ‘‘ डाकुओं का गिरोह ’’ कहा है।

 महास्थान अभिलेख चन्द्रगुप्त को बंगाल का स्वामी बताता है।

 परिशिष्टिपर्वन के अनुसार चन्द्रगुप्त जैन धर्म का अनुयायी था।

 रूद्रदामन के लेख में चन्द्रगुप्त मौर्य नाम प्राप्त होता है।

 तमिल ग्रंथ ‘‘ अहनानुरू ’’ तथा ‘‘ पुरूनानुरू ’’ चन्द्र की दक्षिण विजय की पुष्टि करते हैं। (तिनेवली प्रदेश जीता)

 चन्द्रगुप्त ने मगध सेनापति भद्रशाल को हराकर मगध पर विजय प्राप्त की।

 यूनानी ग्रंथें के अनुसार चन्द्रगुप्त ने जैनों के अहिंसा के सिद्धांत का पालन नहीं किया तथा यज्ञ एवं बलि भी देता रहा।

 जूनागढ़ का प्रशासन ‘ पुष्पगुप्त ’ नामक अधिकारी को दिया तथा बाद में अशोक ने यह प्रशासन तुषाष्क नामक यूनानी अधिकारी को सौंपा।

बिन्दुसार ( ई0पू0 298 से ई0पू0 273 )

यह चन्द्रगुप्त मौर्य का पुत्र था। वायु पुराण में इसे भद्रसार, जैन ग्रंथों में ‘ सिंहसेन ’ तथा यूनानी ग्रंथों में ‘ अमित्रोपेट्स ’ (अमित्रघात) कहा गया है। जैन साहित्य इसकी माँ का नाम दुर्धरा बताते हैं। ‘‘ परिषिष्टिपर्वन् ’’ में इसे समय से पूर्व माँ का उदर फाड़ कर पैदा होना बताया गया है। उदर फाड़ने का कार्य संभवतः चाणक्य ने किया तथा रक्त के एक बूंद से उत्पन्न होने पर नाम बिंदुसार रखा। बिन्दुसार नाम बौद्ध साहित्य द्वारा संज्ञेय है।

मुख्य घटनाएं :-

तक्षशिला का विद्रोह :- बौद्ध ग्रंथ ‘ दिव्यावदान ’ से ज्ञात होता है कि तक्षशिला के गर्वनर सुसीम के खिलाफ हुए विद्रोह का दमन अवन्ति के गर्वनर अशोक ने शांतिपूर्वक किया।

स्वस (खस ) जाति का विद्रोह :- लामा तारानाथ के अनुसार तक्षशिला को शांतकर अशोक ने नेपाल की खस जाति के विद्रोह को शमित किया।

परराष्ट्र संबंध :-

· प्लिनी के अनुसार ‘‘ मिश्र ’’ के राजा ‘ टॉलेमी द्वितीय फिलाडेल्फस ’’ ने अपना राजदूत ‘‘ डायोनियस ’’ को बिन्दुसार के दरबार में भेजा।

· स्ट्रेबो के अनुसार : सीरिया नरेश - एण्टिओकस ने अपना दूत डायमेकस का भेजा।

· एथेनियस के अनुसार : बिन्दुसार ने सीरिया नरेश एण्टिओकस प्रथम स्कोटर को पत्र लिख कर मीठी मदिरा , सूखे अंजीर तथा दार्शनिक भेजने का निवेदन किया था किन्तु यूनानी कानून के कारण वह दार्शनिक नहीं भेज सका।

· प्रारंभ में इसका प्रधान मंत्री चाणक्य था बाद में यह पद खल्लाटक (आर्यमंजूश्री कल्प के अनुसार) को प्रदान किया गया।

· बिन्दुसार दर्शन साहित्य प्रेमी तथा आजीवक संप्रदाय को मानता था।

· पत्नी का नाम - वम्मा (महावंश ) या सुभद्रांगी  ( अशोकावदान ) था।

· लामा तारानाथ के अनुसार इसने एक मात्र विजय ‘‘मैसूर के कुछ प्रदेश’’ की थी। संभवतः

· थेरवादी परम्परा के अनुसार यह ब्राम्हण धर्म का अनुयायी था।

मृत्यु :- ई0पू0 273 को।

अशोक ( ई0पू0 273/2690पू0 से ई0पू0 232 )

प्रारंभिक जीवन :- राजा बिन्दुसार की मृत्यु के बाद यह राजा बना। हमें इसकी प्रारंभिक जानकारी बौद्ध ग्रंथों से ही प्राप्त होती है। अशोक की माता का नाम जनपद कल्याणी या सुभद्रांगी था, जिसके दो पुत्र थे पहला अशोक तथा दूसरा विगताशोक (तिष्य) अपने पिता के शासन काल में यह अवन्ति का राज्यपाल था तथा खस, नेपाल एवं तक्षशिला के विद्रोह को शांत किया। तक्षशिला विद्रोह के दौरान जाते समय मार्ग में ‘‘ विदिशा ’’ के व्यापारी की सुंदर कन्या ‘‘ देवी अथवा महादेवी ’’ से विवाह किया। महावंश के अनुसार इसने अपने 99 भाईयों का वध करके राधागुप्त की सहायता से सिंहासन प्राप्त किया। इसकी दो अन्य पत्नियां  थीं - 1. असंघमित्रा 2. कारूवाकी ( कौशाम्बी लेख से )

साम्राज्य विस्तार :-

कश्मीर विजय : कल्हण ने अपने ग्रंथ राजतरंगिणी में अशोक की कश्मीर विजय का संकेत दिया है। किन्तु यह प्रमाणिक नहीं है। इसे ‘‘ श्रीनगर ’’ का संस्थापक कहा गया है।

कलिंग विजय : ई0पू0 261 को संभवतः नंद वंश के पतनोपरान्त कलिंग स्वतंत्र हो गया था। प्लिनी के अनुसार अंडिका में था कि चन्द्रगुप्त के समय कलिंग स्वतंत्र था। इसे अशोक की एकमात्र विजय माना गया है जिसका उल्लेख तेरहवें शिलालेख में है। कलिंग पर आक्रमण करने का कारण :

1. सुरक्षा की दृष्टि से - क्योंकि कलिंग शक्तिशाली होता जा रहा था।

2. दक्षिण भारत से होने वाले व्यापारिक मार्ग पर एकाधिकार हेतु।

वैसे तत्कालीन समय में कलिंग हाथियों तथा हाथी दांत के लिए प्रसिद्ध था। कलिंग विजय के उपरांत कलिंग का राज्य दो भागों में विभक्त कर दिया गया। जिसमें एक भाग की राजधानी तोसलि तथा दूसरे भाग की राजधानी जौगढ़ बनाई गई। एवं कलिंग का शासन तोसलि ( वर्तमान पुरी जिला ) के राजकुमार को दे दी गई।

तेरहवें शिलालेख से ज्ञात होता है कि कलिंग के रक्तपात से अशोक का ह्रदय परिवर्तन हो गया तथा उसने दिग्विजय त्याग , धम्म विजय को अपना लिया।

अशोक का शासन : अशोक ने लक्ष्यपूर्ति हेतु शासन में निम्नलिखित परिवर्तन किएः‘

1. राजुक, सुत तथा महामात्रों को समय समय पर निरीक्षण कर प्रजा पालन का आदेश देता था।

2. प्रजा की नैतिक तथा आध्यात्मिक उन्नति हेतु धर्मयुत , धर्ममहामात्र तथा स्त्री अध्यक्ष महामात्र की नियुक्ति की।

3. न्यायिक सुविधा एवं शीघ्रता हेतु राजुक को न्यायिक अधिकार प्रदान किए।

4. सभी को समान न्याय की व्यवस्था। तथापि म्त्यु दण्ड प्रचलित था।

अशोक के शिलालेख :- अब तक कुल मिला कर 40 अभिलेख प्राप्त हुए हैं। जिनका वर्गीकरण इस प्रकार है।

अ. चौदह शिलालेख : ये 14 शिलालेख विभिन्न आठ स्थानों से प्राप्त हुए है।

1. शाहबाजगढ़ी ( पेशावर जिला, पाकिस्तान )

2. मानसेरा ( हजारा जिला )

3. जूनागढ़ ( गिरनार जिला ) : पशु अस्पताल बनवाए।

4. कालसी ( देहरादून जिला )

5. सोपारा ( थाना जिला )

6. धौली ( पुरी जिला ) कर्मचारियों द्वारा कलिंग वासियों के प्रति सद्व्यवहार का आदेष।

7. जौगढ़ ( गंजाम जिला )

8. ऐर्रगुड़ी ( हैदराबाद जिला )

धौली एवं जौगढ़ के शिलालेखों पर दो अन्य लेख उत्कीर्ण हैं, जिन्हें पृथक कलिंग प्रज्ञापन कहा गया है। ई0पू0 256 में उत्कीर्ण इन लेखों में नवीन विजित प्रान्त कलिंग के राज्य प्रबंध से संबंधित आदेश हैं।

ब. लघु शिलालेख : ई0पू0 256 में खुदवाए ये लघु शिलालेख दो प्रकार के हैं।

1. अशोक के व्यक्तिगत जीवन से संबंधित :

सासाराम ( बिहार )

बैराट ( राजस्थान )

मस्की ( गुर्जरा ) : यहां से अशोक का नाम प्राप्त हुआ है।

गवीमठ

पल्ली गुण्ड्र

चेरागुड़ी

2. धर्म से संबंधित :

सिद्धपुर

जतिंग

रामेश्वरम

ब्रम्हगिरी

स. सात स्तम्भ लेख : ये लेख भारत के छः स्थानों से प्राप्त हुए हैं।

1. दिल्ली-टोपरा स्तम्भ लेख : खिज्राबाद जिले के टोपरा ग्राम से सुल्तान फिरोज तुगलक इन्हें दिल्ली ले आया। इस पर सात अभिलेख उत्कीर्ण हैं, जबकि अन्य में छः अभिलेख उत्कीर्ण हैं।

2. दिल्ली-मेरठ स्ताम्भ लेख : फिरोज तुगलक द्वारा मेरठ से दिल्ली लाया गया।

3. प्रयाग स्तम्भ लेख : यह मूलतः कोशाम्बी में था जिसमें अशोक के दो लघु लेख हैं। 1. कोशाम्बी लेख 2. रानी कारूवाकी का लेख ( इसमें रानी द्वारा दिए गए दान का उल्लेख है )। इस लेख को अकबर महान द्वारा इलाहाबाद के दुर्ग में रखवाया गया। इस पर दूसरी ओर समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति अंकित है तथा कालान्तर में इस पर जहांगीर ने भी लेख खुदवाया है।

4. लौरिया अराराज : बिहार के पूर्वी चंपारण जिले में स्थित एक ऐतिहासिक स्थल है, जहाँ सम्राट अशोक द्वारा निर्मित एक स्तंभ है जिस पर धर्मलेख खुदा हुआ है

5. लौरिया-नंदनगढ़ : इस शिलालेख से मयूर चित्र प्राप्त होता है।

6. रामपुरवा स्तम्भ लेख : बिहार के पश्चिम चंपारण जिले में स्थित एक पुरातात्विक स्थल है, जहाँ से सम्राट अशोक के दो स्तंभ मिले हैं, जिनमें से एक वृषभ स्तंभ शीर्ष वाला है, जो अब राष्ट्रपति भवन में है, और दूसरा सिंह स्तंभ शीर्ष वाला, जो कोलकाता के भारतीय संग्रहालय में है 

द. लघु स्तम्भ लेख : ये लेख एक प्रकार के राज्य आदेश है। जो निम्न स्थानों से प्राप्त हुए हैं।

सांची: यहाँ उत्कीर्ण लेखमौर्य सम्राट अशोक के शासनकाल और बौद्ध धर्म के प्रसार के बारे में जानकारी प्रदान करते हैं

सारनाथ : सन 1905 में ओटैल द्वारा खोजा गया।

कोशाम्बी : महामात्रों को संघ भेद निषेध  की आज्ञा हेतु।

रूम्मिनदेई ( नेपाल ) : अशोक की धर्म यात्रा, कर नीति (1/61/8 ) इस लेख की खोज फीहरर द्वारा की गई। इस लेख से भगवान बुद्ध के जन्म स्थान की जानकारी प्राप्त होती है।

निग्लीवा :  कनकमुनि स्तूप को दो गुना करने का आदेश इस पर उत्कीर्ण है। इस लेख की खोज भी फीहरर द्वारा की गई।

इ. भाब्रू शिलालेख : राजस्थान के बैराट से प्राप्त इस लेख में अशोक के बौद्ध अनुयायी होने का प्रमाण स्पष्ट है।

फ. गुफा लेख : प्राप्त गुफा लेखों की संख्या तीन है। ये लेख बिहार स्थित गया जिले की बाराबर की पहाड़ियों पर स्थित चार गुफाओं में से तीन की दीवारों पर अंकित हैं। इनमें आजीवक सम्प्रदाय को निवास हेतु गुफा दान का उल्लेख है।

अन्य प्रमुख अभिलेख :

महास्थान अभिलेख : अशोक द्वारा अन्न भण्डारण तथा राहत कार्य उल्लिखित इस लेख से मौर्य साम्राज्य के अंग के रूप में बंगाल का उल्लेख है। ( चन्द्रगुप्त का बंगाल पर अधिकार था। )

कंधार अभिलेख : अशोक के प्रभाव से मछुआरों तथा बहेलियों ने जीव हिंसा का त्याग कर दिया था।

सौहगोरा अभिलेख : जन कल्याणकारी कार्यों का विवरण।

निगाली सागर तथा संघ भेद लेख : बौद्ध धर्म के प्रति निष्ठा

ब्रम्हगिरी शिलालेख : शिष्य द्वारा गुरू का आदर करना चाहिए।

शार-ए-कुना लेख : द्विभाषी अभिलेख है। ( ग्रीक तथा अरमाइक )

चौदह शिलालेख तथा उनमें वर्णित तथ्य :

शिलालेख                                     वर्णित तथ्य

प्रथम              - अहिंसा, सभी मनुष्य मेरे बच्चे हैं।

द्वितीय            - जन कल्याण, संगम राज्य, चोल सत्ता

तृतीय             - साम्राज्य के दौरे

चतुर्थ             - जनपद अधिकारी राजुक का वर्णन

पंचम              - 20 वें वर्ष जीव हत्या निषेध, बंदी मुक्ति, धर्म महामात्र की नियुक्ति तथा कार्य

षष्टम              - ऋण तथा स्वर्ग की अवधारणा

सप्तम              - अशोक द्वारा जनता को धर्मोपदेश देना।

अष्टम             - धर्म यात्रा, सम्बोधि यात्रा, चोल सत्ता

नवम              - निरर्थक कर्मकाण्डों का खण्डन, धम्म मंगल वर्णन , धम्म पालन से स्वर्ग प्राप्ति

दसम              - धम्म नीति के पालन के गुणों की पुनरावृत्ति करता है और                   यश और कीर्ति की चाहत की निंदा करता है, धम्म  

         की लोकप्रियता पर बल देता है। 

एकादशम        - धम्मदान सर्वोपरि है।

द्वादशम           - सर्व धर्म सम भाव।

त्रयोदशम        - कलिंग विजय, वैदेशिक संबंध, धम्म विजय, संगम                                    राज्य,  अहिंसा।

चर्तुदशम         - प्रजा के प्रति पितृवत प्रेम।

अशोक का धम्म : कलिंग युद्ध की वीभत्सता ने अशोक का हृदय परिवर्तन कर दिया। तथा बिम्बिसार की अंग विजय शुरू हुआ मगध का साम्राज्य वाद कलिंग विजय के उपरांत धम्मवाद में वरिवर्तित हो गया। महावंष के अनुसार अशोक ब्राम्हण धर्म का अनुयायी था तथा कल्हण के अनुसार अषोक, शैव मत का पोषक था। किन्तु महावंश - दीपवंश के अनुसार अशोक अपने विधिवत् राज्याभिषेक (ई0पू0 269 ) के चौथे वर्ष अपने बड़े भाई सुमन (सुसीम) के पुत्र श्रमण निग्रोध से प्रभावित हो कर बौद्ध धर्म की ओर आकृष्ट हो गया। किन्तु प्रमाणिक ग्रंथ दिव्यावदान के अनुसार भिक्षु उपगुप्त ने इसे बौद्ध धर्म से दीक्षित किया। संभवतः ये दोनों नाम एक ही व्यक्ति के हो सकते हैं क्योंकि दोनों को ही सात वर्षीय बालक कहा गया है। इस तरह अशोक ने अपना धर्म परिवर्तन किया।

अपने दूसरे तथा सातवें शिलालेख में अषोक ने अपने धम्म के दो उपावदान बताए हैं।

1. व्यावहारिक या सकारात्मक

2. नकारात्मक

1. व्यावहारिक रूप : ये द्वितीय तथा लघु शिलालेख में वर्णित है।

धम्म मंगल : 9 वें शिलालेख में वर्णित।

धम्म दान : धम्म दान का महत्व 11 वें शिलालेख से प्राप्त है।

धम्म विजय : धम्म द्वारा ऐसी विजय जिससे परमार्थ संभव हो। (13 वां शिलालेख)

सहिष्णुता : सर्व धर्म समभाव। (12 वां शिलालेख)

अहिंसा : सर्व भूतानां , अक्षति च संयमं च। (13 वां शिलालेख)

द्वितीय स्तम्भ लेख में वर्णित धम्म के व्यावहारिक उपावदानों के प्रयोग का तरीका द्वितीय लघु शिलालेख में बताता है। अन्य व्यावहारिक तत्व अग्रलिखित हैं। जीव हत्या न करें, माता पिता की सेवा, वृक्ष सेवा , गुरू सम्मान, मित्र , परिचित , ब्राम्हण तथा श्रमणों के प्रति सम्यक व्यवहार, दास सहिष्णुता, अल्प व्यय तथा अल्प संचय।

2. नकारात्मक रूप : आत्म निरीक्षण कर मन से विकारों को दूर करना। इन्हें अषोक ‘ आसिनव ’ कहता है। तीसरे स्तम्भ लेख में आसिनव का अर्थ ‘‘ पाप ’’ बताया गया है। तथा कहता है कि निम्न विकार आसिनव के प्रेरक हैं : उग्रता , निष्ठरता, क्रोध, घमण्ड तथा ईर्ष्या। इन विकारों से आत्म निरीक्षण द्वारा बचा जा सकता है। अभिलेख में आत्म निरीक्षण को ‘‘ परीक्षा ’’ कहा गया है।

धम्म प्रचार के उपाय : धम्म प्रचार हेतु अशोक ने लगन से कार्य किया तथा स्वयं को संघ का घोषित किया। प्रथम शिलालेख में यज्ञों में पशु बलि रोकने की विज्ञप्ति दी। राजकीय रसोई के माँसाहारी भोजन में कमी की। मँहगे उत्सवों पर रोक लगाई गई। षिकार तथा विहार यात्राओं के स्थान पर धम्म यात्राएं प्रारंभ की गई। राज्य कर्मचारी - प्रादेशिक , राजुक तथा युक्त आदि को प्रत्येक पाँच वर्ष में धर्म प्रचार यात्रा करने का आदेश दिया गया। अभिलेखों में इस प्रचार यात्रा को ‘‘ अनुसंधान ’’ कहा गया है। अशोक ने अपनी प्रथत धम्म यात्रा राज्याभिषेक के दसवें वर्ष बोध गया हेतु की , जिसे अभिलेखों में ‘‘ संबोधि यात्रा ’’ कहा गया है। 20 वें वर्ष में लुम्बिनी की यात्रा कर उस ग्राम को करमुक्त ग्राम घोषित किया तथा निग्लीवा में कनकमुनि स्तूप का विस्तार किया। पाँचवा शिलालेख जो राज्याभिषेक के 14 वर्ष बाद का है। में ‘‘ धम्म महामात्र ’’ के नवीन पद का सृजन है , यह धम्म के प्रचार का प्रमुख अधिकारी था। अशोक ने अपने प्रचारक विदेषों में भी भेजे , जो निम्नानुसार थे।

मज्झान्तिक - कश्मीर एवं गांधार

मंझिम - हिमालय

सोन एवं उत्तरा - सुवर्ण भूमि

रक्षित - उत्तरी कनारा

धर्म रक्षित - पश्चिम भारत

महा रक्षित - यवन राज्य

महा धर्म रक्षित - महाराष्ट्र

महादेव - मैसूर

महेन्द्र एवं संघमित्रा - ताम्रपर्णि (श्रीलंका ) सर्वाधिक सफल यात्रा

धम्म यात्रा अपनाने के कारण : अशोक ने तत्कालीन सामाजिक तनाव तथा संकीर्णतावादी झगड़ों को समाप्त करने तथा अपने विषाल साम्राज्य के विभिन्न भागों में सौहार्दपूर्ण संबंध विकसित करने धम्म का प्रतिपादन किया।

· बौद्ध धर्म सर्व कल्याणक ( महायान ) था जबकि ब्राम्हण धर्म सीमित जातिगत दायरे में था।

धम्म का स्वरूप :

राजधर्म : फ्लीट इसे बौद्ध धर्म न मान कर ‘ राजाओं का साधारण धर्म ’ कहते हैं।

सार्वभौम धर्म : स्मिथ , मुकर्जी तथा त्रिपाठी कहते हैं कि इसमें ‘‘ स्वर्ग की कल्पना ’’ बौद्ध धर्म के विपरीत है।

ब्राम्हण धर्म : पवित्रता , स्वर्ग तथा सत्य की बात पर फादर रेवरैण्ड हैरास धम्म को ब्राम्हण धर्म ही मानते हैं। इसका समर्थन एच0 एस0 विल्सन करते हैं।

उपासक बौद्ध धर्म : डॉ0 भण्डारकर , सेनार्ट तथा हुल्ष के अनुसार धम्म का मूल प्रेरक स्त्रोत बौद्ध धर्म ही था। इसी तथ्य को सर्वमान्य रूप से स्वीकार किया गया है।

धम्म से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य :

 धम्म में वर्णित व्यावहारिक तत्व ‘‘ दीर्घनिकाय ’’ में वर्णित हैं।

 धम्म की सहिष्णुता का सिद्धांत बौद्ध ग्रंथ ‘‘ चुल्लबग्ग ’’ तथा ‘‘ महावग्ग ’’ से लिया गया है।

 भाब्रु के अभिलेख में अशोक में अशोक द्वारा ने उपासकों के अध्ययन हेतु सात धर्म परियायों का वर्णन किया है।

 गार्गी संहिता में अशोक द्वारा धम्म विजय पालन की निंदा की गई है।

 राज्याभिषक से संबंधित लघु शिलालेख ( रूपनाथ , जबलपुर ) में अशोक ने स्वयं को ‘‘ बुद्ध शाक्य ’’ कहा है।

 तृतीय संगीति का साहित्यिक स्त्रोत ‘‘ दीपवंश - महावंश ’’ हैं।

 संघभेद अभिलेख ( सांची तथा सारनाथ ) में संघ में फूट डालने वाले को संघ से निकालने का आदेश है , यही आदेश कोशाम्बी तथा पाटलिपुत्र के महामात्रों को दिया गया था।

 अशोक ने धम्म की परिभाषा ‘‘ राहुलोवाद सुत्त ’’ से ली है। इस सुत्त को ‘‘ गेहविजय ’’ ( गुहस्थों का अनुशासन ग्रंथ ) भी कहा गया है।

अशोक की मृत्यु : ( ई0पू0 232 ) दिव्यावदान के अनुसार अशोक का अंत अत्यंत दुःखद हुआ। जब यह ‘‘ कुक्कुटाराम विहार ’’ को एक बड़ा दान देने वाला था , तो मंत्रियों ने राजकुमार संप्रति जो अशोक का पौत्र था के साथ मिल कर इस आज्ञा की अवहेलना की।

अशोक से संबंधित स्मरणीय तथ्य :

 संभवतः कलिंग विजय के समय अशोक बौद्ध था।

 सन 1750 ईस्वी में सर्वप्रथम टीफैंथेलर ने अशोक के अभिलेख (दिल्ली) को खोजा जिसे सन 1837 ईस्वीं में सर्वप्रथम जेम्स प्रिंसेप ने पढ़ा तदुपरांत अभिलेखों के आधार पर ही सर्वप्रथम डॉ0 भण्डारकर ने अशोक का इतिहास लिखने का प्रयास किया।

 जूनागढ़ लेख (रूद्रदामन) में अपरांत (पश्चिम भारत) में अषोक के गर्वनर के रूप में यवन राज तुषष्क का नाम प्राप्त होता है। जो कि सहिष्णुता का एक उदाहरण है।

 श्रीलंका के शासक तिस्स को बौद्ध धर्म की दीक्षा महेन्द्र ने दी इसने अशोक का अनुकरण कर ‘‘ देवनामप्रिय ’’ उपाधि भी धारण की।

 अशोक से प्रभावित हो टालमी फिलाडेल्फस ( मिश्र ) ने भारतीय ग्रंथों का सुरक्षित पुस्तकालय ‘ सिकंदरिया ’ में स्थापित किया।

 अशोक , कश्मीर में ‘‘ विजयेश्वर मंदिर ’’ का पुनः उद्धारक था। तथा इसने ललितपाटनएवं श्रीनगर की स्थापना की। देवपाटन नगर (नेपाल)की स्थापना संभवतः अशोक की पुत्री चारूमती द्वारा की गई।

पुराणों में यह अशोकवर्धन के नाम से वर्णित है। जूनागढ़ लेख में पूरा नाम ‘‘ अशोक मौर्य ’’ प्राप्त होता है।

उपगुप्त मथुरा का बौद्ध भिक्षु था।

अशोक का अंतिम शिलालेख ( मस्की ) सन 1915 ईस्वी में ‘ बीडन ’ द्वारा खोजा गया।

भाब्रु शिलालेख आज ‘‘ कलकत्ता संग्रहालय ’’ में रखा है।

म्रून वेडेल ने मयूर चिन्ह (नंदनगढ़) को र्मार्यों का प्रतीक बताया।

तेरहवें शिलालेख में वर्णित प्रमुख समकालीन यवन राजा निम्नलिखित थे : 1. एन्तिओक ( सीरिया ) 2. तुरमय(मिश्र) 3. अन्तिकिन ( मेसीडोनिया ) 4. मग ( सेरिन ) 5. अलेक्जेण्डर ( कोरिन्थ )

बाराबर पहाड़ी स्थित अशोक की चार गुफाएं 1. कर्ण 2. चोपार 3. सुदामा 4. विश्व झोपड़ी

अशोक की पत्नियां तथा उनसे उत्पन्न पुत्र :

1. आसन्दी मित्रा -  कोई संतान नहीं

2. तिष्य रक्षिता - जालौक

3. पद्मावती - कुणाल

4. कारूवाकी - तीवर

5. महादेवी - महेन्द्र एवं संघमित्रा

अशोक ने बोधिवृक्ष ( पीपल ) की शाखा श्रीलंका भेजी थी।

अशोक के उत्तराधिकारी :-

जालौक : कल्हण की राजतंरंगिणी के अनुसार यह अशोक का पुत्र था। कल्हण कहता है कि अशोक के बाद साम्राज्य विघटन प्रारंभ होने लगा तो पुत्र जालौक , कश्मीर का स्वतंत्र शासक बन गया। जालौक तथा उसकी पत्नी ईशान देवी दोनों ही शिव भक्त थे।

लामा तारानाथ के अनुसार वीरसेन गांधार का शासक बना।

कुणाल ( ई0पू0 232 से ई0पू0 224 ) : अशोक के चार पुत्र थे। 1. महेन्द्र  2. तीवर  3. कुणाल 4. जालौक । कुणाल शासक बना क्योंकि महेन्द्र भिक्षु हो गया तथा तीवर की मृत्यु हो गई थी। कुणाल का अन्य नाम सुयश मिलता है। जैन तथा बौद्ध मान्यता है कि अशोक की रानी तिष्य रक्षिता के षडयंत्र से यह अंधा हो गया था। अतः वास्तविक शासन सम्प्रति ( कुणाल का पुत्र )के हाथ में रहा। किन्तु पुराणों के अनुसार कुणाल का पुत्र दशरथ था।

दशरथ ( ई0पू0 224 से ई0पू0 216 ) : यह अशोक का पौत्र था। विष्णु पुराणानुसार यह कुणाल के बाद शासक बना। किन्तु जैन एवं बौद्ध मत इसे सीधे अशोक का उत्तराधिकारी मानते हैं। इसके विषय में पुरातात्विक प्रमाण प्राप्त होते है। इसने ‘ देवनाम प्रिय ’ की उपाधि ली तथा नागार्जुनी पहाड़ी ( बिहार ) पर गुफा व बिहार बना कर आजीवक सम्प्रदाय को दान में दी। अतः इसे आजीवक सम्प्रदाय का अनुयायी माना जाता है। इन गुफाओं के नाम हैं - 1. लोमष ऋषि की गुफा 2. गोपिका गुफा

सम्प्रति ( ई0पू0 216 से ई0पू0 207 ) : यह अशोक का पौत्र था तथा दशरथ का भाई था। इसने अपने राज्य की दूसरी राजधानी उज्जियिनी को बनाया। जो स्थान बौद्ध साहित्य में अशोक को प्राप्त है वही स्थान जैन साहित्य में सम्प्रति को मिला है। इसने श्रावणबेलागोला जा कर संल्लेखना द्वारा प्राण त्याग किया। कुछ मान्याताओं के अनुसार छल करके इसकी हत्या की गई थी।

नोट : प्रमाणिक मान्यता है कि मगध का राज्य दो भागों में बँट गया तथा पूर्वी मगध का शासक दशरथ ( पाटलिपुत्र ) एवं पश्चिमी मगध का शासक सम्प्रति ( उज्जियिनी ) था।

शालिशुक ( ई0पू0 207 से ई0पू0 206 ) : गार्गी संहिता के अनुसार यह सम्प्रति का धूर्त एवं अधार्मिक पुत्र था। जिसने ‘‘ सुभगसेन ’’ की उपाधि ली थी। इसे ही ‘‘ बृहस्पति ’’ भी कहा गया है।

देवधर्मन् ( ई0पू0 206 से ई0पू0 199 ) : मौर्य साम्राज्य के 7वें सम्राट थे। उन्होंने 202-195 ईसा पूर्व की अवधि में शासन किया। पुराणों के अनुसार, वे शालिशुक मौर्य के उत्तराधिकारी थे और उन्होंने सात वर्षों की छोटी अवधि तक शासन किया।

शत धनुष ( ई0पू0 199 से ई0पू0 191 ) :

ब्रहद्रथ ( ई0पू0 191 से ई0पू0 184 ) : विष्णु पुराण तथा हर्ष चरित से ज्ञात होता है कि यह अंतिम मौर्य शासक था। इसका शासन काल भ्रष्ट व अराजकता से पूर्ण था अतः ब्राम्हण सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने इसकी हत्या कर मौर्य वंश की मशाल बुझा दी। तथा शुंग वंश स्थापित किया।

मौर्यों के पतन का कारण :

1. अशोक की धार्मिक नीति के स्वरूप हुई ब्राम्हणों की प्रतिक्रिया। -हर प्रसाद शास्त्री

2. अशोक की शांतिप्रियता व अहिंसा की नीति जिससे शुंगों ने सैन्रू क्रांति हुई। -हेमचन्द्र राय चौधरी

3. मौर्य शासकों की आर्थिक दुर्बलता। -डॉ0 डी0डी0 कौशाम्बी

4. केन्द्रीय नौकरशाही व्यवस्था और एक राज्य अथवा राष्ट्र ( राष्ट्रीयता )का अभाव। -रोमिला थापर

5. दुर्बल उत्तराधिकारी । -डॉ0 आर0के0 मुखर्जी

मौर्य प्रशासन

स्त्रोत : अर्थशास्त्र जिसे ई0पू0 चौथी सदी का माना गया है। इण्डिका तथा शिलालेख।

केन्द्रीय प्रशासन :

राजा : साम्राज्य का केन्द्र बिन्दु राजा था। यहां विवेकपूर्ण वंशानुगत राजतंत्रात्मक शासन प्रणाली थी। राजा सर्वाधिकार प्राप्त था किन्तु निरंकुश नहीं था। राजा के प्रमुख तीन कर्त्तव्य थे।

1. शासन संबंधी : राज्याधिकारियों की नियुक्ति , अर्थ विभाग का निरीक्षण , विदेशी संबंध , गुप्तचर व्यवस्था तथा कल्याणकारी आदेश।

2. न्याय संबंधी : राजा , राज्य का सर्वोच्च न्यायाधीश होता था।

3. सैनिक संबंधी : राजा , राज्य का सर्वोच्च सेनापति होता था।

मंत्री : मंत्रियों की नियुक्ति के समय इनके चरित्र तथा योग्यता को जांचा एवं परखा जाता था। इस प्रक्रिया को ‘‘ उपधा परीक्षण ’’ ( उपधा शुद्धम् ) कहा जाता था। मंत्रियों को राज्य रूपी रथ का दूसरा पहिया कहा गया है। कौटिल्य के अनुसार राजा को परामर्श देने हेतु दो सभाएं थीं -

1. मंत्रि सथा ( मंत्रिणः ) - इस सभा में सदस्यों की संख्या 3 - 12 तक होती थी। इनमें से ही एक को प्रधानमंत्री बनाया जाता था। प्रत्येक महत्तवपूर्ण विषय पर पहले ‘ मंत्रिणः ’ विचार करती थी।

2. मंत्रि परिषद ( परिषा ) - मंत्रि परिषद 12 - 30 सदस्यों वाली एक बड़ी संस्था थी इसकी तुलना वैदिक कालीन ‘‘समिति’’ से की जा सकती है। इसके प्रमुख सदस्य ही मंत्रिणः में स्थान प्राप्त करते थे। परिषद के बैठक भवन को ‘‘ मन्त्र भूमि ’’ कहा गया है।

विभागीय व्यवस्था : मंत्री के सहयोग हेतु एक केन्द्रीय नौकरशाही व्यवस्था थी। प्रशासनिक सुविधा की दृष्टि से 18 विभागों की स्थापना की गई थी। इन विभागों को ‘‘ तीर्थ ’’ कहा गया है। प्रत्येक विभाग के संचालन एवं निरीक्षण हेतु एक अध्यक्ष था , जो ‘‘ आमात्य ’’ कहलाता था। जिनका विवरण निम्नानुसार है -

क्रं0               आमात्य                                       तीर्थ / कार्य

1.                 मंत्री                        राजा इसके परामर्श पर अन्य अमात्यों की नियुक्ति करता था।

2.                 पुरोहित                   राजा इसके परामर्श पर अन्य अमात्यों की नियुक्ति करता था।

3.                 समाहर्ता                 राजस्व अधिकारी ( वित्त मंत्री )

4.                 सन्निधाता                राजकोष का अधिकारी

5.                 सेनापति                 युद्ध विभाग का प्रमुख

6.                 युवराज                  इसे किसी भी विभाग का प्रमुख बना सकते थे।

7.                 प्राड्विवाक             प्रधान न्यायाधीश

8.                 नायक                   रण स्थल ( सेना व छावनी ) का संचालक

9.                 कार्मान्तिक             उद्योग विभाग का प्रमुख

10.               मंत्रि परिषदाध्यक्ष    राजा का सलाहकार

11.               दण्डपाल                सैन्य आवश्यकताओं की पूर्ति करना

12.               अन्तःपाल              सीमावर्ती क्षेत्रों तथा दुर्गों का रक्षा अधिकारी

13.               दुर्गपाल                 राज्य के आंतरिक दुर्गों का संचालक

14.               नागरिक व पौर      नगर प्रशासन का सर्वोच्च अधिकारी

15.               प्रषास्ता                अक्षपटलक ( राज्यादेषों को लिपि बद्ध करना ) का प्रमुख

16.               दौवारिक              राज प्रासाद का प्रधान अधिकारी

17.               आंर्तवेषिक            राजा के अंगरक्षक व अंतःपुर का प्रधान

18.               आटविक              वन सेना का प्रधान

उपयुक्त अमात्यों के अतिरिक्त कौटिल्य ने अपने ‘‘ अध्यक्ष प्रचार ’’ अध्याय में 26 अध्यक्षों का उल्लेख किया है। इन अध्यक्षों को यवन लेखकों ने ‘‘ मजिस्ट्रेट ’’ कहा है। ये निम्नलिखित हैं - 1. खन्याध्यक्ष ( साँभर उत्पत्ति ) 2. आकाराध्यक्ष ( खदानें ) 3. लोहाध्यक्ष 4. स्वर्णाध्यक्ष 5. लक्षणाध्यक्ष (टकसाल) 6. कोष्ठागाराध्यक्ष 7. पण्याध्यक्ष (वाणिज्य - व्यापार) 8. शुल्काध्यक्ष 9. कुप्याध्यक्ष (वन सम्पत्ति) 10. मुद्राध्यक्ष (पासपोर्ट) 11. पौतवाध्यक्ष (नाप - तौल) 12. सुराध्यक्ष 13. सूत्राध्यक्ष (कपड़ा) 14. सीताध्यक्ष (कृषि) 15. सूनाध्यक्ष (कसाईखाना) 16. गणिकाध्यक्ष 17. नावध्यक्ष (बंदरगाह) 18. विविताध्यक्ष (चारागाह) 19. पत्याध्यक्ष (पैदल सेना) आदि थे।

अध्यक्षों के अधीन कर्मचार जो केन्द्र तथा स्थनीय शासन के बीच की कड़ी थे, युक्त या उपयुक्त कहलाते थे। जैसे कुशीलव (संगीतज्ञ) , आरोहक (महावत) ,उपयुक्त (क्लर्क), कार्तान्तिक (भविष्यवक्ता), मौहातिक (ज्योतिषी)। कर्मचारियों को नगद वेतन मौर्य कालीन मानक सिक्का ‘‘ पण ’’ में दिया जाता था।

प्रान्तीय शासन : विशाल मौर्य साम्राज्य को छः प्रान्तों में विभक्त किया गया था। प्रान्तों को ‘‘ चक्र ’’ कहा जाता था। चक्र के शासक को कुमार कहते थे।

चक्र                                   राजधानी

गृहराज्य                              पाटलिपुत्र

उत्तरापथ                             तक्षशिला

दक्षिणापथ                           स्वर्णगिरि

कलिंग                                तोसलि

अवन्ति                               उज्जियिनी

सेल्युकस द्वारा प्रदत्त क्षेत्र          कपिशा

प्रान्त जिलों में विभक्त थे , जिन्हे ‘‘ आहार या विषय ’’ कहा जाता था। जिले का शासक ‘‘ स्थानिक ’’ कहलाता था। स्थानिक के अधीन 10 गाँव का प्रधान ‘‘ गोप ’’ होता था।

ग्राम प्रशासन : प्रशासन की इस न्यूनतम इकाई का प्रमुख ‘‘ ग्रामणि ’’ होता जो ग्राम वासियों द्वारा गठित ग्राम सभा का प्रमुख होता था। ग्राम एक अर्द्ध स्वतंत्र प्रजातांत्रिक इकाई थे।

ग्राम समूह      अधीन कुल ग्राम          प्रधान                       विशेष

संग्रहण             10 ग्राम                  गोप

खार्वटिक          200 ग्राम              स्थानिक                    ये सभी समाहर्ता के अधीन होते थे।

द्रोणमुख           400 ग्राम              स्थानिक

स्थानिक           800 ग्राम              स्थानिक

नगर प्रशासन : नगर का प्रधान अधिकारी ‘‘ नागरिक ’’ था। नगर को ‘‘ पौर ’’ कहा गया है। इण्डिका के अनुसार नगर प्रशासन 5 - 5 लोगों की छः समितियों के पास था।

1. शिल्प कला समिति

2. वैदेशिक समिति

3. जनसंख्या समिति

4. वाणिज्य समिति

5. उद्योग समिति

6. कर समिति

न्याय प्रशासन : दण्ड व्यवस्था कठोर थी अतः अपराध कम होते थे। सबसे छोटा न्यायालय ‘‘ ग्राम न्यायालय ’’ था। इसका प्रधान ‘ ग्रामणि ’ होता था तथा अंतिम बड़ा न्यायालय ‘ राजा ’’ स्वयं होता। ग्राम न्यायालय के ऊपर क्रमशः संग्रहध ,  द्रोणमुख , स्थानिक , जनपद तथा केन्द्रीय न्यायालय पाटलिपुत्र था। ग्राम व राजा के न्यायालय के अलावा सभी न्यायालय निम्नानुसार दो प्रकार के थे।

1. धर्मस्थीय न्यायालय : यह एक तरह की दीवानी अदालत थी। जिसका प्रमुख न्यायाधीश ‘‘ व्यावहारिक ’’ कहलाता था। इसमें विवाह , दायभाग (वारिस) , मानहानि के अतिरिक्त साहस (चोरी, डकैती एवं लूट का दण्ड), वाक् पारूष्य (मानहानि) , दण्ड पारूश्य (मारपीट) के मुकदमें भी सुने जाते थे।

2. कण्टकशोधन न्यायालय : यह एक फौजदारी अदालत थी। जिसका प्रधान ‘‘ प्रदेष्टा ’’ होता था।

राजस्व प्रशासन : इस युग में पहली बार राजस्व प्रणाली की रूप रेखा तय की गई। राज्य की आय का मुख्य साधन ‘‘ भूमिकर ’’ था। जो सिद्धांततः पैदावार का 1/6 भाग था। पर व्यवाहारिक रूप में 1/4 लिया जाता था। राज्य भूमिकर वसूली समूचे ग्राम से न करके कृषक से व्यक्तिगत ( रैयतवाड़ी ) करता था। भूमि पर राज्य का संरक्षण होता था स्वामित्व नहीं। प्रमुख आय कर निम्नलिखित थे -

सीता - राज्य के स्वामित्व वाली भूमि से आय

राष्ट्र - जनपदों से प्राप्त आय

भाग - कृषक के स्वामित्व वाली भूमि से आय

सेतु - बगीचों से प्राप्त आय

दुर्ग - विभिन्न नगरों से प्राप्त आय

मुद्रा - नगर प्रवेश कर

वारिकादेय - धनी व्यक्तियों पर अतिरिक्त कर

वणिक - गाँवों में व्यापार पर कर

प्रवेष्य - आयात कर

निष्काम्य - निर्यात कर

वर्तनी - यातायात कर

वास्तुक - संपत्ति के हस्तांतरण पर कर

बलि - तीर्थ या देवघरों से आय

वणिक पथ - जल - स्थल पथ के व्यापार पर कर।

इसके अतिरिक्त वर्तमान समयानुसार ‘‘ बिक्री कर ’’ भी लिया जाता था और नहीं देने पर मृत्युदण्ड का प्रावधान था।

पुलिस एवं गुप्तचर व्यवस्था : इस समय पुलिस को ‘‘ रक्षिन ’’ कहा जाता था। समग्र प्रशासन पर नजर रखने हेतु गुप्तचर व्यवस्था थी। अर्थशास्त्र में गुप्तचर को ‘‘ गूढ़ पुरूष ’’ कहा गया है। साधारणतया ये ‘ चर ’ कहलाते जिन्हें यवन ‘ ओव्हरसियर ’ या ‘ इंसपेक्टर ’ कहते थे। स्त्री गुप्तचर भी होते थे। गुप्तचरों का प्रधान अधिकारी ‘‘ महामात्रासर्प ’’ कहलाता था। गुप्तचर दो प्रकार के होते थे - 1. संस्था 2. संचार। गुप्त संदेश या लिखाई भी होती थी।गुप्तचर व्यवस्था आधुनिक जर्मनी की जासूसी के समान थी।

सैन्य प्रशासन : प्लूटार्क ने कहा था ‘‘ छः लाख सैनिको के साथ चन्द्रगुप्त मौर्य ने सारे भारत को रौंद डाला। ’’ सैन्य विभाग छः समितियों में विभक्त था। 1. पैदल 2. नौ 3. अष्व 4. हाथी 5. रथ 6. सैन्य सेवा

विभिन्न शस्त्रास्त्रों के अलावा ‘‘ सर्वतोभद्र ’’ नामक एक यंत्र था जो शत्रु पर पत्थरों की वर्षा करता था। बहुमुख , अर्द्धबाहु , जामदग्न्य प्रमुख यंत्र थे। दुर्गों का भी महत्व था , जो पांच प्रकार के होते थे। 1. स्थल दुर्ग 2. जल दुर्ग 3. वन दुर्ग 4. गिरि दुर्ग 5. मरू दुर्ग।

लोकोपकारी कार्य :

देवमातृका - वर्षा आधारित कृषि

अदेवमाका - सिंचाई पर कृषि

मौर्य कालीन सामाजिक दशा :

वर्ण व्यवस्था तथा वर्णाश्रम : इण्डिका में मेस्थनीज जो कि वर्ण तथा व्यवसाय के भेद से अनभिज्ञ था , ने सात जातियां बताई हैं। 1 दार्षनिक 2. कृषक 3. पशुपालक 4. कारीगर 5. योद्धा 6. निरीक्षक 7. मंत्री

वैसे कौटिल्य के अनुसार चार वर्णों के अलावा वर्णसंकर जातियां भी थीं।

ब्राम्हण : वेदपाठी ब्राम्हणों को कर हीन भूमि दी जाती थी जिसे ‘‘ ब्रम्हदेय ’’ कहा गया है। ब्राम्हणों के अलावा कोई भी वर्ण अंर्तजातीय विवाह नहीं कर सकता था।

शूद्र : शूद्रों को कृषि करने का अधिकार प्राप्त हो गया था तथा अर्थषास्त्र में शूद्र को भी ‘ आर्य ’ कहा गया है। आर्य शूद्र को दास बनाना प्रतिबंधित कर दिया गया।  इतिहास में यह प्रथम अवसर था जब शूद्र को कृषि अधिकार प्रदान कर उत्पादन में भागीदार बनाया गया। सभी व्यक्ति चारों आश्रमों का पालन करते थे।

परिवार : समाज की प्रमुख इकाई परिवार ही था। परिवार संयुक्त होते थे। जो समाज की न्यूनतम इकाई थे।

विवाह : विवाह का प्रमुख उद्देष्य संतानोत्पत्ति था। आठ प्रकार सभी विवाह प्रचलित थे। अर्थशास्त्र में ‘ असुर विवाह ’ भी स्वीकृति प्राप्त है। स्त्री तथा पुरूष दोनों को ही पुर्नविवाह का अधिकार प्राप्त था। नियोग प्रथा को अर्थशास्त्र से समर्थन प्राप्त है। बाल विवाह तथा बहु पत्नी प्रथा थी किन्तु दहेज प्रथा प्रचलित नहीं थी।

स्त्री दशा : स्त्रियों की स्थिति स्मृति काल की अपेक्षा उत्तम किन्तु पुरूष के अधीन हो गई थी। स्वतंत्र रूप से वैश्यावृत्ति में रत स्त्रियों को ‘‘ रूपाजीवा या समाजीवा ’’ कहा गया है। जो स्त्रियां घर की चहार दीवारी में रहतीं थीं ‘‘ अनिष्कासिनी ’’ कहलाती थीं। सती प्रथा निषिद्ध थी किन्तु पर्दा प्रथा का प्रचलन प्रारंभ होने लगा था।

दास प्रथा : मेगस्थनीज ने दास प्रथा नहीं थी कहा है किन्तु कौटिल्य नौ प्रकार के दासों का उल्लेख करता है।दासों के प्रति सौम्य व्यवहार किया जाता था।

मौर्य कालीन आर्थिक दशा :

राज्य की अर्थव्यवस्था कृषि , पशु पालन तथा वाणिज्य - व्यापार पर आधारित थी , जिसे सम्मिलित रूप से ‘‘ वार्ता ’’ कहा जाता था।

कृषि : कौटिल्य ने कृषि के संबंध में छः प्रकार के मौसम बताए हैं। सिंचाई पर पर्याप्त ध्यान दिया जाता था। जैसे - सुदर्षन झील का निर्माण। भूमि तीन प्रकार की होती थी। 1. कृष्ट ( जुती हुई ) 2. अकृष्ट ( बिना जुती ) 3. स्थल ( बंजर ) सिंचाई का प्रमुख साधन नहरें थीं। सिंचाई पर ‘‘ उदकभागम ’’ नामक कर आरोपित किया जाता था।

पशुपालन : पशु पालन हेतु चारागाह की व्यवस्था थी तथा इनके देखभाल हेतु ‘‘ गोपालक ’’ की नियुक्ति की गई थी।

वाणिज्य तथा व्यापार : इस समय आंतरिक तथा बाह्य व्यापार समृद्ध था। इस काल का प्रमुख उद्योग कपड़ा उद्योग था। काशी , पुण्ड्र तथा मालवा सूती वस्त्र के प्रमुख केन्द्र थे। बंग - मलमल तथा काषी व पुण्ड्र रेशम केन्द्र थे। जबकि छोटा नागपुर की तांबा तथा मैसूर की स्वर्ण खदानों का सर्व प्रथम उपयोग मौर्य काल से ही प्रारंभ हुआ। उच्च कोटि का रेशम ( चीन पट्ट ) का आयात चीन से किया जाता था। स्थल मार्गी व्यापार हेतु प्रमुख राजमार्ग तक्षशिला से पाटलिपुत्र होते हुए ताम्रलिप्ति तक जाता था। मार्ग निर्माण कार्य ‘ एग्रोनोमोई ’नामक अधिकारी के अधीन था। सर्वाधिक लाभदायक स्थल मार्ग दक्षिण मार्ग था जो हिमालय से उत्तर मैसूर तक जाता था।

जल मार्ग से व्यापार हेतु पूर्वी तट का प्रमुख बंदरगाह ताम्रलिप्ति था। तथा पश्चिमी तट का प्रमुख पत्तन भृगुकच्छ तथा सोपारा (मुंबई) थे।  स्थल की अपेक्षा जल मार्ग से व्यापार करना अधिक सुरक्षित था। विदेशी व्यापार मिश्र , सीरिया , अदन तथा लंका से होता था। भारत एवं मिश्र के व्यापार वृद्धि हेतु टॉलेमी ने लाल सागर के तट पर ‘‘ बरनिस ’ नामक बंदरगाह स्थापित किया।

व्यापारियों तथा उद्योगपतियों के संघ बने थे जो श्रेणी कहलाते थे। श्रेणी आधुनिक बैंकों की तरह कार्य करते थे। तत्कालीन प्रमुख मुद्राएं निम्नलिखित थीं।

सोने का सिक्का : सुवर्ण या निष्क

रजत मुद्रा : कार्षापण या धरण

ताम्र मुद्रा : काकणी या माषक

मानक मुद्रा : पण ( रजत मुद्रा )

डॉ0 आर0 एस0 शर्मा के अनुसार मौर्य अर्थव्यवस्था का एक पहलू नागरिकों से अत्यधिक कर की वसूली करना भी था।

जैसे :- प्रणय : आपातकालीन कर ,

उत्संग : उत्सवों पर राजा को भेंट

हरण्य : नगद सिंवार्द कर

उद्गभागम : उपज के रूप में सिंचाई कर ,

कड़ा : फल - फूलों पर कर ,

सेनाभक्त : सीमावर्ती किसानों द्वारा रसद हेतु प्रदत्त कर।

मौर्य कालीन धार्मिक दशा :

ब्राम्हण धर्म प्रधान था। तथापि बौद्ध , आजीवक तथा निग्रंथ भी प्रमुख थे। सम्पूर्ण मौर्य काल में आजीवकों का प्रभाव उल्लेखनीय रहा है। मेगस्थनीज ने ‘‘ मण्डनिक ’’ नामक श्रमण तथा सिकंदर के बीच हुए वार्तालाप का उल्लेख मेगस्थनीज द्वारा इंडिका में किया गया है।

मौर्य कालीन कला एवं स्थापत्य :

नगर निर्माण एवं राज प्रासाद : अशोक ने अनेक नगरों की स्थापना की थी। जैसे श्रीनगर , ललितपट्टन। स्ट्रेबो ने इंडिका के उद्धरण से कहता है कि ‘‘ पालिब्रोथा ( पटना ) गंगा - सोन के संगम पर समानान्तर चर्तुभुजाकार में 80 स्टेडिया लम्बा तथा 18 स्टेडिया चौड़ा था। ’’वर्तमान कुम्रहार ग्राम से प्राप्त अवषेष पाटलिपुत्र के राज प्रासाद की वैभव गाथा है। यह राजप्रासाद काष्ठ निर्मित था। जिसे फाह्यान ने देवताओं द्वारा निर्मित कहा है। कुम्रहार से महल के सभा भवन के अवशेष प्राप्त हुए हैं।

गुहाएं : काष्ठ के स्थान पर सर्वप्रथम पत्थर से भवन निर्माण कराने वाला मौर्य राजा अशोक था। अशोक को गुहा वास्तुकला जन्मदाता कहा जाता है। जो संभवतः यूनानीयों से प्रभावित था। गुफाएं मुख्यतः आजीवक सम्प्रदाय के भिक्षु का आवास थीं। अशोक का अनुसरण ( बाराबर की गुफा ) करते हुए उसके पौत्र दषरथ ने नागार्जुनी पहाड़ी पर किया है।

स्तूप : स्तूप का प्रथम उल्लेख ऋग्वेद से प्राप्त होता है। जो मृत्तिकावषेष सुरक्षित रखने बनाए जाते थे। स्तूप की चोटी पर रखे धातु पात्र को देवसदन कहा जाता था। अषोक के काल में निर्मित बोध गया की पाषाण वेदिका को बोधिमण्ड कहा जाता है। अशोक ने साँची , भारहुत एवं धमेख स्तूप का निर्माण कराया।

स्तम्भ : मौर्य कला के सर्वोत्तम नमूने धम्म प्रचारार्थ निर्मित अशोक के स्तम्भ हैं। ये चुनार ( मिर्जापुर ) के बलुआ पत्थर के एकाष्मक पत्थरों पर निर्मित हैं। इनकी उच्च कोटि की पॉलिश से भ्रमित होकर कोरयट एवं विटेकर पीतल निर्मित तथा हीबर ने धातु के स्तम्भ कहा है। स्तम्भों के मुख्यतः तीन भाग हैं। 1. शॉफ्ट 2. केपिटल 3. अबाकस एवं जानवर शीर्षों पर बने चिन्ह प्रतीकात्मक रूप हैं। एकाष्मक स्तम्भों में सर्वश्रेष्ठ सारनाथ स्तम्भ है।

मूर्तिकला और लोक कला : मूर्तिकला के सर्वोच्च उदाहरण स्तम्भों पर निर्मित हैं। धौली से प्राप्त हाथी की मूर्ति सर्वश्रेष्ठ है। परखमग्राम की यक्षमूर्ति , दीदारगंज की चामर ग्रहिणी यक्ष मूर्ति लोक कला के प्रमुख उदाहरण हैं।

कला पर प्रभाव : स्पूनर के अनुसार पारसी तथा स्मिथ के अनुसार पारसी तथा यूनानी प्रभाव ।

स्मरणीय तथ्य :

 कौटिल्य का अर्थशास्त्र सन 1905 ईस्वी को प्राप्त हुआ था तथा उसी समय प्रकाशित भी किया गया।

 मैगस्थनीज ने दार्शनिकों के दो प्रकार बताए थेः 1. ब्रैखमेन 2. सरमेन

 अर्थशास्त्र तथा छांदोग्योपनिषद में इतिहास को ‘‘ पंचम वेद ’’ कहा गया है।

 मैगस्थनीज ने भारतीयों को लेखन कला से अनभिज्ञ बताया है।

 स्पूनर के अनुसार मौर्य पारसीक थे।

 प्राचीनतम सर्वाधिक महत्वपूर्ण राज व्यवस्था शास्त्र - अर्थशास्त्र ( चौथी सदी ई0पू0 में रचित )

 कलिंग के विस्थापितों के आजीविका हेतु उन्हें नवीन भूति के निर्माण का कार्य सौंपा गया था।

 निरीक्षकों का राज्य में दौरा प्रत्येक पांच वर्ष के अंतराल में होता था।

 अशोक के शासन काल की अवधि 37 वर्ष थी।

 अशोक के धम्म की परिभाषा ‘ दीघनिकाय ’ के ‘ राहुलोवादसुत्त ’ से ली गई है।

 अशोक के स्तम्भ शीर्ष , दीर्घ निकाय के राहुलोवाद सूत्र से ली गई है।

 अशोक के स्तम्भ शीर्ष , पर्सिपोलिस के स्तम्भ शीर्ष के समान है।

 कल्हण के अनुसार कश्मीर मौर्य साम्राज्य का अंग था।

 मौर्य काल में ब्याज दर 15 प्रतिशत वार्षिक थी।

 विवाद का सामान्य कारण भूमि विवाद था।

 मौर्य काल में मृत्यु दण्ड प्रचलित था।

 अशोक की धम्म नीति असफल थी।

 भारत में प्रथम साम्राज्यवादी प्रयोग मौर्य साम्राज्य के दौरान हुआ।

 सर्वप्रथम जनगणना का कार्य मौर्य काल में ही प्रारंभ हुआ।

 कौटिल्य के अर्थशास्त्र में चन्द्रगुप्त मौर्य का कोई उल्लेख नहीं है।

 विदेशियों को भगाने का प्रथम श्रेय मौर्य शासकों को प्राप्त है।

 हिंदुकुश पर्वत तक अंग्रेजों के पहले मात्र मौर्यों ने ही विजय प्राप्त की।

 अशोक ने केवल राजा मागधि की उपाधि धारण की।

 चाणक्य का जीवनवृत्त - परिशिष्टिपर्वन ( हेमचंद्र ) में उद्धृत है।


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